निजता का अधिकार है मौलिक अधिकार — Apex Court 

नयी दिल्ली।  वर्ष 2011 से सवा सौ करोड़ जनता ही भारत में है। यह हम नहीं कहते, कई मंचों पर प्रधानमंत्री समेत तमाम विपक्षी दल यह कहते आए हैं। और उन्ही सवा सौ करोड़ लोगों को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाले एक फैसल में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला किया। कोर्ट ने 9 सदस्यीय बेंच ने अपने ऐतिहासिक फैसले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना है। जे.एस. खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पूरे भाग तीन का स्वाभाविक अंग है।

पीठ के सभी नौ सदस्यों ने एक स्वर में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया। इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर आया यह फैसला विभिन्न जन-कल्याण कार्यक्रमों का लाभ उठाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा आधार कार्ड को अनिवार्य करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुडा हुआ है।

कुछ याचिकाओं में कहा गया था कि आधार को अनिवार्य बनाना उनकी निजता के अधिकार का हनन है।

यह थे 9 जस्टिस जिन्होने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

चीफ जस्टिस आॅफ इंडिया जे.एस.खेहर,  न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर,  न्यायमूर्ति एस ए बोबडे,  न्यायमूर्ति आर के अग्रवाल,  न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन,  न्यायमूर्ति ए एम सप्रे,  न्यायमूर्ति डी वाई चन्द्रचूड,  न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर ।

सभी ने एक मत से माना — निजता का अधिकार मौलिक अधिकार

सभी ने समान विचार व्यक्त किये। इससे पहले, प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने इस सवाल पर तीन सप्ताह के दौरान करीब छह दिन तक सुनवायी की थी कि क्या निजता के अधिकार को संविधान में प्रदत्त एक मौलिक अधिकार माना जा सकता है।

यह सुनवायी दो अगस्त को पूरी हुयी थी। सुनवायी के दौरान निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल करने के पक्ष और विरोध में दलीलें दी गयीं। इस मुद्दे पर सुनवायी के दौरान अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल, अतिरक्त सालिसीटर जनरल तुषार मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता सर्वश्री अरविंद दातार, कपिल सिब्बल, गोपाल सुब्रमणियम , श्याम दीवान, आनंद ग्रोवर, सी ए सुन्दरम और राकेश द्विवेदी ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल करने या नही किये जाने के बारे में दलीलें दीं और अनेक न्यायिक व्यवस्थाओं का हवाला दिया था।

निजता के अधिकार का मुद्दा केंद्र सरकार की तमाम समाज कल्याण योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिये आधार को अनिवार्य करने संबंधी केंद्र सरकार के कदम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवायी के दौरान उठा था। शुरू में तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने सात जुलाई को कहा था कि आधार से जुडे सारे मुद्दों पर वृहद पीठ को ही निर्णय करना चाहिए और प्रधान न्यायाधीश इस संबंध में संविधान पीठ गठित करने के लिये कदम उठायेंगे।

इसके बाद, प्रधान न्यायाधीश के समक्ष इसका उल्लेख किया गया तो उन्होंने इस मामले में सुनवायी के लिये पांच सदस्यीय संविधान पीठ गठित की थी. हालांकि, पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 18 जुलाई को कहा कि इस मुद्दे पर फैसला करने के लिये नौ सदस्यीय संविधान पीठ विचार करेगी।

संविधान पीठ के समक्ष विचारणीय सवाल था कि क्या निजता के अधिकार को संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार घोषित किया जा सकता है। न्यायालय ने शीर्ष अदालत की छह और आठ सदस्यीय पीठ द्वारा क्रमश: खडक सिंह और एम पी शर्मा प्रकरण में दी गयी व्यवस्थाओं के सही होने की विवेचना के लिये नौ सदस्यीय संविधान पीठ गठित करने का निर्णय किया था।

इन फैसलों में कहा गया था कि यह मौलिक अधिकार नहीं है। खडक सिंह प्रकरण में कोर्ट ने 1960 में और एम पी शर्मा प्रकरण में 1950 में फैसला सुनाया था।

प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने दो अगस्त को फैसला सुरक्षित रखते हुए सार्वजनिक दायरे में आयी निजी सूचना के संभावित दुरुपयोग को लेकर चिंता व्यक्त की थी और कहा था कि मौजूदा प्रौद्योगिकी के दौर में निजता के संरक्षण की अवधारणा एक हारी हुई लड़ाई है।

इससे पहले, 19 जुलाई को सुनवायी के दौरान पीठ ने टिप्पणी की थी कि निजता का अधिकार मुक्म्मल नहीं हो सकता और सरकार के पास इस पर उचित प्रतिबंध लगाने के कुछ अधिकार हो सकते हैं।

अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने दलील दी थी कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकारों के दायरे में नहीं आ सकता क्योंकि वृहद पीठ के फैसले हैं कि यह सिर्फ न्यायिक व्यवस्थाओं के माध्यम से विकसित एक सामान्य कानूनी अधिकार है।

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