जहाँ कुछ भी अनसर्टेन है वहां इतनी श्योर कैसे हैं ये लड़कियां, सरकारों मत बांधों बेड़ियाँ

वैसे मैं सोशल मीडिय के प्लैट्फ़ॉर्म पर ज्यादा लिखता नहीं हूँ, मैं क्यों लिखूं ? उससे ज्यादा संजीदा सवाल कोई मुझे क्यों पढ़ें? सबसे अव्वल मैंने किया भी कुछ नही! तस्वीरों में प्रधान का नाम मैग्नीफ़ाइड है आपके तय करने के लिए
छत्तराड़ी माता मंदिर/www.mediaamantra.com
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बात कल कि है जब सारी दुनियां प्रपोज डे मना रही थी, उसी शाम मैं हिमाचल के चम्बा जिले में पड़ने वाले ऐतिहासिक छत्तराड़ी माता मंदिर में था। सिर्फ दर्शंन करने के बाद क्योंकि मैं अब मन्नते नहीं मांगता हूँ, गाँव घूमने का मन हुआ। कुछ देर पैदल चलने के बाद गाँव में दाखिल हुआ लोगों से मुलाक़ात हुई और डेढ़ घंटे बाद वापस लौटने की योजना बनी, मंदिर से बमुश्किल 25 मीटर दूरी पर कुछ लड़कियां मिली जो वहां आने वाले प्राकृतिक श्र्वोतों से धीरे धीरे आने वाले पानी को इकठ्ठा कर रही थी। अधखिले फूल से प्यारी और कोमल मटमैले से आवरण वाली इन बेटियों की उम्र बमुश्किल 16 से 20 वर्ष के बीच रही होगी। लौटने में देर हो रही थी लेकिन मैंने उनसे बात चीत करने की सोची।
आज के दौर में बच्चों से बातचीत के दौरान पूछे जाना पहला सवाल लोग उनकी शिक्षा को लेकर ही करते है, मैंने भी वही सवाल उनसे पूछने की हिमाकत कर दी, सबसे पहले एक ने बताया कि उसने प्लस टू( जिसे जमा दो या इंटरमीडिएट कि परीक्षा कहते है)। उसके आगे क्या करना है जब तक यह सवाल का वह जवाब खोजती तबतक दूसरे और तीसरे से यही सवाल कर डाला। जिसमे से एक ने प्लस टू की पढ़ रही थी दूसरी ग्यारहवीं। तब तक पहली लड़की से मैं मुखातिब था, आगे क्या करेगी, लेकिन इस सवाल ने उसे बेहद असहज कर दिया। वह कुछ बोले उससे पहले ही उसकी उलझने और नाकाम हो चुकी हसरतों ने लगभग साड़ी कहानी कह डाली थी,
दूसरी और तीसरी लड़कियों की तरफ मैंने देखा दोनों ने यही कहा अब प्लस टू के बाद नहीं पढ़ पाउंगी। क्योंकि घर वाले पढ़ा भी नहीं पायेंगे वजह साफ़ थी पास में कोई कालेज में ही नहीं था, जिसमे वह अपने आगे की पढ़ाई करके अपने सपनों को पंख दे सकें अपनी उम्मीदों को उड़ान दे सकें। यह वही प्रांगण था जहाँ शक्तिरूपी छत्तराड़ी माता मंदिर से लोग अपने लिए लाखों दुवाएं मांगने आते हैं।
बात महज दो मिनट की थी लेकिन तब से अब तक मेरे दिमाग से उतर ही नहीं रही है, इस भागमभाग की जिन्दगी में जहाँ कुछ भी निश्चित नहीं हैं, वहां ये लड़कियां आखिर इतनी आश्वस्त कैसे हो सकती हैं। आखिर यह आत्मविश्वास उन्हें कहाँ से मिला है, कि कुछ भी हो जाए वह आगे नहीं पढ़ सकती है। वैसे आज तक राजनीति ने देश के जो हालत बनाए है, वह इसी तरह के आत्मविश्वाश देने का काम करते हैं, जहाँ किसानों को उनकी उपज का पूरा दाम नहीं मिलता है, जहाँ पास में स्कूल कालेज नहीं होता है कि बिना घर छोड़े, बिना शहर में जा बसे उच्च शिक्षा हासिल नहीं की जा सकती है।
अभी मन इस उधेड़ बुन से निकला भी नहीं था कि सुबह सुबह अखबार में तेलका महाविद्यालय को सरकार द्वारा न बंद करने की गुजारिश छपी थी। लोग कानो कान सरकार द्वारा इस कॉलेज को बंद करने की खबर सुनकर सहमे थे। खबर के मुताबिक़ तेलका के इस कालेज में सूदूर की 15 पंचायतों में कुल 57 बच्चे पढ़ते हैं जिनके परिवार की माली हालत ठीक नहीं है। दूसरा आंकड़ा और चौकाने वाला था कि इनमे से 43 लड़कियां थी, इस कॉलेज के बंद होने के साथ ही उनके कॉलेज जाने और जिन्दगी में और कुछ करने के सपनों पर बेड़ियाँ लग जायेगी। ऐसे ही कई कालेज है जिनके बंद होने की बातें सरकार द्वारा की जा रही हैं। इस तरह से लोगों के सपनों से खेलने का चुनावी खेल भी बंद होन चाहिए।
मैं किसी गाँव में पानी भर रही तीन लड़कियों से मिला या पिछले दो हफ्ते में जिन सैकड़ों से मिला बात सिर्फ उनकी ही नहीं है, ऐसे देश में हजारों गाँव हैं और उनमे लाखों ऐसी बच्चियां है जिनके पास संतोष करने के अलावा कोई चारा नही है, बात महज इतनी सी है कि जब हम प्रधान मंत्री से लेकर दुनिया से सबसे बड़े नेताओं और संस्थाओं की बातें सुनते है तो उनका सबसे प्रमुख मुद्दा महिला शिक्षा और उनका सशक्तिकरण ही होता है, लेकिन इसके बाद भी आज यह स्थिति है कि यही बेटियां यही लड़कियाँ चाहते हुए अपने सपने मार लेती हैं। क्योंकि हम आज़ादी के इतने साल बाद भी इतना भी हासिल नहीं कर पाए कि अत्याधुनिक और आधुनिक शिक्षा तो छोड़ दीजिये उच्च शिक्षा भी इन्हें न उपलब्ध करवा पायें। यकीन मानिये साहब इन्सान के सपनों का मर जाना उसके मर जाने से भी बदतर होता है। बस एक बार महसूस करिए अपने सपने के मर जाने के एहसास को काँप जायेंगे, इसलिए गुजारिश है मत मरने दीजिये इन सपनों को, इस तन्द्रा से बाहर आइये, जागिये और कुछ करिए, जिससे लोगों का नहीं खुद का सामना हो तो हम खुद को जवाब दे सकें……
ved prakash singh/www.mediaamantra.com
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वेद प्रकाश सिंह के फ़ेसबुक वाल से

 

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