भारतीय जनसंचार और राजशास्त्र की परंपरा पर कार्यशाला

वाराणसी-  संप्रेषण और संचार से समाज और संस्कृति का निर्माण होता है। पश्चिमी कॉमिक चरित्रों का आरोपण भारतीय मनीषी प्रवाह में पाश्चात्य प्रतिरोध के रूप में स्पष्ट दिखता है। भारतीय परम्परा में आख्यान यानी नरेटिव को ज्ञान के गठन और संचरण दोनों की विधा के रूप में स्वीकार किया गया है। सम्प्रेषण की बाधा से उबरने के लिये भरतीय मनीषियों ने जन्तु कथाओं की खोज की जिसका प्रयोग विश्व की सभी सभ्यतायें देढहज़ार साल से कर रही हैं।पंचतंत्र की कथाओं में शेर, सियार, मेढ़क, सर्प, वृक्ष, नदी के माध्यम से, मानवीय संवेदनाओ का प्रकृति से तादाम्य सहज ही दिखलाई पड़ता है। इसी से एंटरटेनमेंट कम्युनिकेशन की आधारशिला पड़ती है।आज जरूरत है ऐसे अकादमिक शोधों की जिसमें संचारीय तत्वों को भारतीय दृष्टिकोण से समझा जाय।” उक्त विचार काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पत्रकारिता व जनसप्रेषण विभाग के अध्यक्ष प्रो  अनुराग दवे ने व्यक्त किया। वह भारत अध्ययन केंद्र द्वारा आयोजित दस दिवसीय कार्यशाला के चौथे दिन ‘पंचतंत्र और संचार के तत्व’ विषय पर बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि पंचतंत्र की अंतर्वस्तु का विश्लेषण करते हुए  में राजशास्त्र, अर्थशास्त्र के साथ साथ नाट्यशास्त्र का भी ज्ञान सुलभता से प्राप्त होता है क्योंकि इस एकमात्र ग्रंथ में समस्त वेदों, उपनिषदों और स्मृतियों का सार मिलता है।
कार्यशाला के द्वितीय सत्र में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो० कमलेश दत्त त्रिपाठी ने पंचतंत्र में अर्थशास्त्र और राजशास्त्र विषयों की विवेचना की। उन्होंने कहा कि पारम्परिक राजशास्त्र और आधुनिक राजशास्त्रीय सिद्धान्तों में प्राथमिक अंतर सत्ता और प्रभाव का है। पंचतंत्र प्रभावशाली सत्ता को रेखांकित करता है तो आज का समाज सत्ता के प्रभाव को बतलाता है।
इस अवसर पर डॉ0 मलय कुमार झा, डॉ0 गीता योगेश भट्ट, मीनाक्षी पांडेय, राजीव झा, धीरज कुमार गुप्ता, पल्लव पाठक, गोविंद कुमार, ईशान त्रिपाठी सहित बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित रहे। अतिथियों का स्वागत डॉ ज्ञानेंद्र राय ने किया। संचालन व धन्यवाद ज्ञापन डॉ  अनूपपति तिवारी   ने किया।
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