एडवोकेट हैदर की पहल पर हाइकोर्ट में महत्वपूर्ण संसोधन, त्वरित न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय अब 2 दिन में ही दे सकेंगे जमानत के लिए नोटिस

लखनऊ।  सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय की नियमावली में एक जनहित याचिका के कारण महत्वपूर्ण बदलाव कर दिया गया है। इस बदलाव में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 10 दिन बाद वाले जमानत नियम को संशोधित कर दिया गया है। अब जमानत नियम की अवधि 10 दिन से घटा कर 2 दिन कर दी गयी है। इसकी वजह भी बना लखनऊ के सीनियर एडवोकेट मोहम्मद हैदर रिज़वी का सामाजिक सरोकारों के प्रति जुनून और आधुनिक युग का अतिविकसित संचार माध्यम, जिसके चलते 35 साल से चली आ रही हाइकोर्ट की नियमावली को संशोधित कर दिया गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के चैप्टर 18 के नियम 18 का उपनियम 3a, जो कि उच्च न्यायालय में जमानत अर्जी की सुनवाई के पूर्व शासकीय अधिवक्ता को 10 दिन की नोटिस की बाध्यता सुनिश्चित करता था, हमारे प्रयासों से संशोधित हो गया है, एवं उक्त अवधि अब घटा कर 10 दिनों के स्थान पर 2 दिन कर दी गई है।

इस पूरे प्रकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता व समाजसेवी मोहम्मद हैदर ने जानकारी देते हुए बताया कि यह नियम नियमावली में 35 सालों से अधिक समय से था, जिसके चलते जेल में निरुद्ध हज़ारो लोगों के जीवन के मौलिक अधिकार का हनन हो रहा था। उन्होंने बताया संचार माध्यमों के अतिविकसित हो जाने के बाद इसकी कोई आवश्यकता नही थी।

उन्होंने बताया कि इस संबंध में हाइकोर्ट में सफलता न मिलने पर हमने सुप्रीम कोर्ट की ओर रुख किया और वहाँ जनहित याचिका दाखिल की। जिसपर माननीय उच्चतम न्यायालय ने जुलाई 2018 में माननीय उच्च न्यायालय को 6 सप्ताह में निर्णय लेने के आदेश जारी किए थे।

उन्होंने बताया कि विगत 14 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रत्यावेदन रखने संबंधी पत्र में यह उल्लखित किया गया है कि मामले।में तुरंत फैसला लेना होगा।
वही इस मामले में कई कानूनविदों समेत वरिष्ठ अधिवक्ताओ ने भी इस फैसले पर खुशी जाहिर की है। उनका मानना है कि इस बदलाव से एक तो विकसित संचार माध्यमो का कोर्ट और सामान्य जनता को फायदा मिलेगा साथ ही निर्णय संबंधी प्रक्रिया में बहोत तेज़ी भी आ जायेगी।। एडवोकेट हैदर रिज़वी ने बताया कि यह नियम, जो कि नियमावली में 35 वर्षो से अधिक समय से था, के तत्क्रम में हज़ारों व्यक्तियों के जीवन के मौलिक अधिकार का हनन हो रहा था। यह पुरातन नियम वर्तमान समय में , जबकि संचार के माध्यमों में क्रांति आ गई है, अपना आधार एवं औचित्य खो चुका था। उन्होंने कहा कि
यह संशोधन उन हज़ारों लोगों हो समर्पित है, जो बिना सुनवाई के न्यूनतम 10 दिनों तक न्यायिक अभिरक्षा में जेल में रहते थे। मौलिक अधिकारों के हनन का इससे बड़ा दृष्टांत कोई अन्य नहीं था।

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